व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन |
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् || 41||
व्यवसाय-आत्मिका-दृढ़ संकल्प; बुद्धि:-बुद्धि; एका-एकमात्र; इह-इस मार्ग पर; कुरु-नन्दन-कुरु वंशी; बहु-शाखा:-अनेक शाखा; हि-निश्चय ही; अनन्ताः-असीमित; च-भी; बुद्धयः-वुद्धि; अव्यवसायिनाम्-संकल्प रहित।
BG 2.41: हे कुरुवंशी! जो इस मार्ग का अनुसरण करते हैं, उनकी बुद्धि निश्चयात्मक होती है और उनका एक ही लक्ष्य होता है लेकिन जो मनुष्य संकल्पहीन होते हैं उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं मे विभक्त रहती है।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन |
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् || 41||
हे कुरुवंशी! जो इस मार्ग का अनुसरण करते हैं, उनकी बुद्धि निश्चयात्मक होती है और उनका एक ही लक्ष्य होता …
Sign in to save your favorite verses.
Sign In
Navigate directly to the wisdom you seek
Start your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!
आसक्ति मानसिक क्रिया है। इसका अभिप्राय यह है कि मन बार-बार अपनी आसक्ति के विषयों की ओर भागता है जो किसी व्यक्ति, इन्द्रिय विषय, प्रतिष्ठा, शारीरिक सुख त्यादि में हो सकती है। यदि किसी व्यक्ति या इन्द्रिय विषय का विचार हमारे मन में बार-बार उठता है तब निश्चय ही यह मन का उसमें आसक्त होने का संकेत है। यदि यह मन ही आसक्त हो जाता है तब भगवान इस आसक्ति के विषय के बीच बुद्धि को क्यों लाना चाहते हैं। क्या आसक्ति का उन्मूलन करने में बुद्धि की कोई भूमिका होती है? हमारे शरीर में सूक्ष्म अंत:करण होता है जिसे हम बोलचाल की भाषा में हृदय भी कहते हैं। यह मन, बुद्धि और अहंकार से निर्मित होता है। इस सूक्ष्म शरीर में बुद्धि मन से श्रेष्ठ है जो निर्णय लेती है जबकि मन में इच्छाएँ उत्पन्न होती है और यह बुद्धि द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार मोह के विषयों में अनुरक्त हो जाता है।
उदाहरणार्थ यदि मनुष्य की बुद्धि यह निर्णय करती है कि धन सम्पत्ति ही सुख का साधन है तब मन में धन प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हो जाती है। यदि बुद्धि यह निश्चय करती है कि जीवन में प्रतिष्ठा ही सबसे महत्त्वपूर्ण है तब मन में प्रतिष्ठा और ख्याति पाने की अभिलाषा उत्पन्न होती है। दूसरे शब्दों में, मन में बुद्धि के बोध के अनुसार इच्छाएँ विकसित होती हैं।
पूरे दिन हम अपने मन को बुद्धि द्वारा नियंत्रित करते हैं। जब हम अपने घर में होते है तब हम अनौपचारिक मुद्रा में रहते हैं जिसमें मन भी सहजता का अनुभव करता है जबकि अपने कार्यालय में रहते हुए हम औपचारिक मुद्रा में रहना सही समझते हैं। ऐसा नहीं है कि मन कार्यालय की औपचारिकताओं में प्रसन्न रहता है, अपितु वह अवसर मिलते ही अपेक्षाकृत घर जैसी अनौपचारिकताओं को अंगीकार करना चाहता है। इस प्रकार हमारी बुद्धि निश्चय करती है कि कार्यालय में औपचारिक आचरण का पालन करना अनिवार्य है। इसलिए बुद्धि मन को नियंत्रित करती है और हम पूरे दिन अपने कार्यालय में औपचारिक मुद्रा में रहते हैं और हमें मन की प्रकृति के विपरीत औपचारिक शिष्टाचार का पालन करना पड़ता है। इसी प्रकार मन कार्यालय के कार्यों में सुख अनुभव नहीं करता। यदि उसे स्वतंत्र छोड़ दिया जाए तब वह कार्यालय में कार्य करने की अपेक्षा घर में बैठकर टेलीविजन देखना चाहेगा किन्तु बुद्धि उसे यह आदेश देती है कि जीवन निर्वाह हेतु कार्यालय में बैठकर कार्य करना अनिवार्य है। इसलिए बुद्धि पुनः मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाती है और लोग आठ घंटे या अधिक समय तक कार्य करते हैं।
उपर्युक्त उदाहरण से हमें यह ज्ञात होता है कि हमारी बुद्धि मन को नियंत्रित करने में सक्षम है। इसलिए हमें अपनी बुद्धि को उचित ज्ञान के साथ पोषित करना चाहिए और उसका प्रयोग मन को उचित दिशा की ओर ले जाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान करने में करना चाहिए।
बुद्धियोग मन को कर्म फलों से विरक्त रखने का विज्ञान है जो बुद्धि में यह दृढ़ निश्चय विकसित करता है कि सभी कार्य भगवान के सुख के निमित्त हैं। ऐसी स्थिर बुद्धि वाला मनुष्य एकाग्रता से अपने लक्ष्य पर ध्यान रखता है और निर्बाध गति से धनुष से छोड़े गए बाण के समान अपने मार्ग को पार कर लेता है। ऐसा साधक यह संकल्प लेता है-"यदि मेरे मार्ग में लाख बाधाएँ उत्पन्न हो जाएँ और यदि सारा संसार मेरी निंदा करे और यदि मुझे अपने जीवन का भी बलिदान क्यों न करना पड़े तब भी मैं अपनी साधना नहीं छोडूंगा।
" साधना की उच्च अवस्था में यह संकल्प इतना अधिक दृढ़ हो जाता है कि साधक को अपने मार्ग पर चलने से कोई डिगा नहीं सकता किन्तु वे लोग जिनकी बुद्धि अनेक शाखाओं में विभक्त है, अपने मन को विभिन्न दिशाओं की ओर भटकते हुए पाते हैं। वे मन की एकाग्रता को विकसित करने में समर्थ नहीं होते जो भगवान की ओर जाने वाले मार्ग के लिए आवश्यक होती है।